
The Power Born From Zero
एक ऐसी दुनिया जहाँ पहचान नाम से नहीं, आत्मशक्ति की रैंक से होती है, विवेक को शून्य रैंक मिली है। दस साल की साधना के बाद भी, वह हर बार....
एक ऐसी दुनिया जहाँ पहचान नाम से नहीं, आत्मशक्ति की रैंक से होती है, विवेक को शून्य रैंक मिली है। दस साल की साधना के बाद भी, वह हर बार अपमानित होता है, हर बार उपहास का पात्र बनता है। आज फिर, आत्मशक्ति शिला पर उसका हाथ रखने पर कोई चमक नहीं दिखती, सिर्फ़ खामोशी और भीड़ का उपहास। लेकिन जब सब उसे असफल मानकर चले जाते हैं, तो उसके कमरे की दीवार पर एक मुक्का एक दरार पैदा करता है, और उस दरार से निकलती है काली धुंध। अँधेरे में डूबे कमरे में एक अनजान आवाज़ गूँजती है: "दस हज़ार वर्षों से, मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।" क्या यह शून्य रैंक वाला युवक सचमुच उतना ही कमज़ोर है जितना दुनिया मानती है, या उसके भीतर कोई प्राचीन शक्ति जागृत होने वाली है जो उसे शून्य से भी ऊपर ले जाएगी?