
Nikhil the Cosmic Rakshak
अंडा फूटते ही कमरे की हवा बदल गई। एक गहरी, प्राचीन आभा फैलने लगी—ऐसी अनुभूति, मानो समय स्वयं थम गया हो। हल्की सुनहरी रोशनी अंडे के भीतर से फूटी और दीवारों....
अंडा फूटते ही कमरे की हवा बदल गई। एक गहरी, प्राचीन आभा फैलने लगी—ऐसी अनुभूति, मानो समय स्वयं थम गया हो। हल्की सुनहरी रोशनी अंडे के भीतर से फूटी और दीवारों पर अजीब-सी छायाएँ नाचने लगीं। निखिल का हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा; उसके जीवनबंध स्थान में छिपी शक्ति मानो जाग उठी हो। टूटे हुए खोल के बीच से एक नन्हा जीव बाहर आया। उसका शरीर छोटा था, लेकिन उसकी उपस्थिति भारी— चार अधजले-से पंख, जिन पर बिजली की पतली धारियाँ चमक रही थीं। उसकी आँखें गहरी नीली थीं, जैसे उनमें पूरा आकाश कैद हो। उसकी चोंच से कभी-कभी चिंगारियाँ फूट पड़तीं, और हर साँस के साथ बिजली-सी गूँज सुनाई देती। यह कोई साधारण जीवनबंध पशु नहीं था। निखिल के मन में एक नाम गूंज उठा— “आदिकालिक बिजली-पक्षी…!” उस पल, निखिल ने महसूस किया कि उसके भीतर कुछ टूट भी गया है और कुछ जन्म भी ले चुका है। तीन वर्षों का अपमान, पीड़ा, बदनामी और क्रोध—सब इस छोटे से जीव से गहरे जुड़ गए। नन्हे पक्षी ने सिर उठाकर निखिल की ओर देखा। उसकी आँखों में कोई मासूमियत नहीं थी— वहाँ न्याय था। वहाँ विनाश था। वहाँ बदले की आग थी। निखिल के होंठ काँपे। “मुर्गा… क्या तुम लौट आए हो?” उत्तर में, उस नन्हे जीव ने पंख फैलाए— और बाहर, दूर इग्निस्पोलिस की दिशा में, बादलों के बीच एक तेज़ बिजली कड़की। मानो स्वर्ग स्वयं गवाही दे रहा हो— सुपर अमर योद्धा का पुनर्जन्म शुरू हो चुका था।