
संध्या, दिल और कुंडली
यह कहानी है संध्या की — एक भोली-सी लड़की जिसकी ज़िंदगी तीन नामों से होकर गुज़री। स्कूल के दिनों में उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी एक सीधी-सादी लड़की, और उसी....
यह कहानी है संध्या की — एक भोली-सी लड़की जिसकी ज़िंदगी तीन नामों से होकर गुज़री। स्कूल के दिनों में उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी एक सीधी-सादी लड़की, और उसी दोस्त का भाई बन गया उसका पहला प्यार। वो एहसास जो छुपा रहा, अधूरा रह गया। फिर वक्त बदला, कॉलेज आया, और कॉलेज में आया नीरज — एक ऐसा दोस्त जिसने बिना शर्त साथ निभाया, हर मुस्कान और हर आंसू में उसके साथ रहा। लेकिन न नीरज को वो प्यार दे सकी, और न पुराने रिश्ते को कोई नाम मिला। ज़िंदगी के मोड़ पर आई शादी की बात — और अचानक वो बन गई राजवर्धन की दुल्हन। एक ऐसा रिश्ता जो कुंडली से तो बंध गया, पर दिल की गांठें अब भी खुली थीं। क्या संध्या अपने अतीत को भुला पाई? क्या दोस्ती, प्यार या रिश्ता — इनमें से किसी को उसने सच में जिया? या उसकी ज़िंदगी सिर्फ समझौते बन कर रह गई? यह सिर्फ एक लड़की की प्रेम कथा नहीं, यह है तक़दीर से टकराती भावनाओं की बुनावट — एक ‘कुंडली से बना रिश्ता’, जो दिल से तय नहीं, लेकिन दिल पर असर छोड़ गया।”