
रणभूमि के सारथी
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में युद्ध शुरू होने से पहले ही एक योद्धा हारने लगा है। अर्जुन, जिसके हाथों में गांडीव है और जिसकी धनुर्विद्या की चर्चा दूर-दूर तक है, आज....
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में युद्ध शुरू होने से पहले ही एक योद्धा हारने लगा है। अर्जुन, जिसके हाथों में गांडीव है और जिसकी धनुर्विद्या की चर्चा दूर-दूर तक है, आज अपने ही गुरुओं, पितामह और संबंधियों को सामने देख विचलित है। उसके मन में मोह और कर्तव्य के बीच ऐसा द्वंद्व छिड़ा है कि गांडीव भी भारी लगने लगा है। क्या इस युद्ध में जीत कर भी वह सब कुछ खो देगा? क्या अपने ही अपनों के विरुद्ध शस्त्र उठाना धर्म है या अधर्म? भगवान श्रीकृष्ण, उसके सारथी, उसे केवल युद्ध के मैदान में ही नहीं, बल्कि जीवन के गहरे प्रश्नों के भंवर से भी निकालने को तैयार हैं। लेकिन क्या अर्जुन अपने मन के इस तूफान से निकलकर उस सत्य को स्वीकार कर पाएगा, जो उसके जीवन की दिशा बदल देगा?