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Urmila's Penance।।रामायण।।

Urmila's Penance।।रामायण।।

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Mythology

अयोध्या के राजमहल में विदाई की रात दीये तेज़ जल रहे थे, पर उर्मिला की आँखों के नीचे पहले ही एक नींद जैसी परछाई बैठ गई थी। लक्ष्मण जब राम-सीता....

अयोध्या के राजमहल में विदाई की रात दीये तेज़ जल रहे थे, पर उर्मिला की आँखों के नीचे पहले ही एक नींद जैसी परछाई बैठ गई थी। लक्ष्मण जब राम-सीता के साथ चौदह वर्ष वन जाने को तैयार हुए, तो कुलगुरु ने चुपचाप कहा था—“कोई तो है जो जागे, कोई तो है जो सोए।” उर्मिला ने सुना और जैसे साँस रोककर हामी भर दी: “मैं सोऊँगी। चौदह वर्ष की नींद, ताकि वह जाग सके।” यह वचन उसने ऊँचे स्वर में नहीं, अपनी हथेलियों की रेखाओं में बाँधा; किसी ने तालियाँ नहीं बजाईं, किसी ने श्लोक नहीं पढ़े। पहली रात से ही नींद साधारण नहीं रही। आँख लगते ही वह अयोध्या नहीं, एक धुंधलके जंगल में उतरती—जहाँ पत्ते सरसराहट में खबरें लाते। उसने स्वप्न में वह कुटिया देखी जहाँ सीता की हँसी मिट्टी के बर्तनों से टकराकर गूँजती, और फिर एक दिन वह हँसी हवा में दरक गई—सीता का हरण। उर्मिला चीखना चाहती, पर उसका गला वही “धर्म का थोपा गया मौन” बन गया था; उसकी जीभ पर नींद की मिट्टी जमी थी। समय स्वप्नों में टुकड़े-टुकड़े होकर आया। वह देखती रही—पर्णकुटी के बाहर लक्ष्मण की परछाई जो रात-रात भर पहरा देती, समुद्र के किनारे व्याकुल प्रतीक्षा, लंका की आग में लहराते धुएँ के काले परचम। हर दृश्य के साथ उसके भीतर कुछ कसता गया—क्या यह तप है या सज़ा? क्या यह त्याग है या उससे छीना गया मौन? कभी-कभी वह स्वप्न में लक्ष्मण के बिल्कुल पास पहुँच जाती—उसकी भौंहों के बीच की शिकन देखती, कलाई की नसों में थकान—और बस छूने ही वाली होती कि नींद उसे पीछे खींच लेती, जैसे किसी ने उसकी चोटी पकड़ ली हो। चौदहवें साल की आहट के साथ अयोध्या में शहनाइयाँ सजने लगीं। दासियाँ कहतीं, “अब जागो, महारानी, लौट रहे हैं।” उर्मिला ने आँखें खोलीं तो उजाला चुभ गया; इतने बरसों की नींद के बाद जागना भी एक तरह की थकान थी। दर्पण में उसने अपना चेहरा देखा—एक अपरिचित सुकून और एक अजीब-सी खाली जगह, जहाँ चौदह साल की अनुपस्थिति बैठी थी। जब लक्ष्मण लौटे—धूप में तपा चेहरा, आँखों में जंगल की रातें—तो दोनों के बीच पहले शब्द नहीं, एक ठहराव आया। वह ठहराव लंबा था, जैसे दो नदियों के बीच की रेत। उर्मिला मुस्कुराई, पर वह मुस्कान सावधानी से बनी थी; भीतर अब भी वही लड़ाई गूँज रही थी जो उसने अकेले लड़ी—स्वप्नों में देखना, पर कुछ न कर पाना; जागते हुए भी न बोल पाने की आदत। लक्ष्मण ने धीरे से उसका हाथ थामना चाहा, और उसने पहली बार महसूस किया कि उसका मौन अब थोपा नहीं, उसका अपना था—वह जब चाहे तोड़ सकती थी, जब चाहे रख सकती थी। अंत वही रहा—राम लौटे, अयोध्या जगी, जय-जयकार हुई। पर उर्मिला की सबसे लंबी लड़ाई लौटने से पहले ही ख़त्म हो चुकी थी—उसने चौदह बरस तक देखना सीखा, बिना कहे समझना सीखा, और अब जागते हुए भी अपने भीतर वह जगह बचाकर रखी जहाँ वह बिना अनुमति के खुद से मिल सके।

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