
Tahkhana
रामगढ़ की सदियों पुरानी, बर्फ और धुंध में लिपटी हवेली। और उस हवेली के नीचे दबा एक ऐसा खौफनाक तहखाना, जहाँ आज भी मौत सांस लेती है। डिटेक्टिव आनंद की ज़िंदगी....
रामगढ़ की सदियों पुरानी, बर्फ और धुंध में लिपटी हवेली। और उस हवेली के नीचे दबा एक ऐसा खौफनाक तहखाना, जहाँ आज भी मौत सांस लेती है। डिटेक्टिव आनंद की ज़िंदगी पहले ही बर्बादी की कगार पर है—पत्नी आरती से तलाक की नौबत, शराब की लत, और एक सड़ा हुआ सिस्टम जो उसे अंदर तक खोखला कर चुका है। अपनी उखड़ी गृहस्थी बचाने और हवेली को बेचने के इरादे से जब आनंद अपने पक्के दोस्त हीरा, पत्नी आरती, साली पन्ना और मुखबिर गपोड़ी के साथ उस हवेली में कदम रखता है, तो उसे अहसास होता है कि रात के सपने जो सिर्फ दृश्य नहीं, अनुभव बन जाते हैं। दरवाज़े पर नींबू में बंधा काला धागा, आईनों में देरी से हिलती परछाइयां, और चौखट के नीचे दफन एक गुड़िया जिसमें आनंद के पिता का नाम सील कर दिया गया है—यह सब इशारा कर रहे थे कि किसी अपने ने ही कुछ करवाया है। आनंद को धीरे-धीरे समझ आता है कि यह दुनिया सीधी नहीं है। यहाँ वशीकरण, मारण, स्तंभन और मोहन—तंत्र के ये चार खौफनाक रास्ते एक-एक करके उसके परिवार को तोड़ रहे हैं। जहाँ एक तरफ तहखाने में सालों से ज़िंदा दफन तांत्रिक 'धुरंजन' की रूह आज़ाद होने के लिए तड़प रही है, वहीं दूसरी तरफ सिस्टम के अंदर बैठा आनंद का अपना 'गुरु' (इंस्पेक्टर भोसले) इस खूनी खेल का मास्टरमाइंड निकलता है। कहानी में शक बदलता रहता है, रिश्ते टूटते रहते हैं, और सुरक्षा व श्राप के बीच की रेखा और पतली होती जाती है। और सबसे बड़ा भूचाल तब आता है जब आनंद के सबसे वफादार दोस्त हीरा के पिता का नाम ही आनंद के पिता के कातिलों में सामने आता है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, और सबसे पक्के दोस्त पर ही कातिल होने का शक हो, तो आनंद किस पर भरोसा करेगा? क्या आनंद अपने परिवार को उस वशीकरण और मारण के जाल से निकाल पाएगा, या वह खुद उसी अँधेरे का हिस्सा बन जाएगा? तहखाने के उस भारी लोहे के दरवाज़े के पीछे असली शैतान कौन है—मुर्दा धुरंजन या ज़िंदा इंसान? अंत तक सबसे बड़ा सवाल—क्या आपका नायक अभी भी वही इंसान है जो कहानी की शुरुआत में था? सुनिए दिल दहला देने वाली सीरीज़— "तहखाना", सिर्फ पॉकेट एफएम पर!
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