
PRITHVI Andar Ka Sach
बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। रात के ठीक 2:07 बजे… सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था। स्ट्रीट लाइट की हल्की पीली रोशनी… और बीच-बीच में बिजली की चमक। और उसी....
बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। रात के ठीक 2:07 बजे… सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था। स्ट्रीट लाइट की हल्की पीली रोशनी… और बीच-बीच में बिजली की चमक। और उसी सन्नाटे को चीरती हुई… एक लड़की भाग रही थी। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे, सांसें टूट रही थीं, बाल चेहरे से चिपके हुए… लेकिन वो रुक नहीं रही थी। जैसे रुकना मतलब… खत्म हो जाना। उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा— अंधेरा। लेकिन… उसे यकीन था… कोई उसका पीछा कर रहा है। कदमों की आवाज। धीमी… लेकिन साफ। ठक… ठक… ठक… “कोई है?” उसकी आवाज कांप रही थी। कोई जवाब नहीं। अचानक उसका पैर फिसला— और वो जोर से जमीन पर गिर गई। उसका फोन हाथ से छूटकर पानी में गिरा। स्क्रीन झिलमिलाई… लेकिन बंद नहीं हुई। वो घुटनों के बल उठी, फोन उठाया… और कांपते हाथों से एक नंबर मिलाया। रिंग… रिंग… रिंग… एक छोटे से कमरे में, फाइलों के ढेर के बीच, एक आदमी कुर्सी पर झुका हुआ था। उसकी आंखें बंद थीं… लेकिन नींद गहरी नहीं थी। फोन की घंटी बजती रही। पहले उसने नजरअंदाज किया… लेकिन कॉल बार-बार आने लगी। आखिरकार उसने फोन उठाया— “Hello… कौन?” लड़की की सांसें तेज थीं। “Sir… sir please… मुझे बचा लीजिए… वो लोग—” पीछे से वही आवाज… ठक… ठक… ठक… उसकी आवाज अचानक रुक गई। उसने धीरे से पीछे देखा… और उसका चेहरा जैसे पत्थर बन गया। आंखें फैल गईं… होठ कांपने लगे… “Sir… ये आत्महत्या नहीं है… वो लोग—” लाइन अचानक कट गई। कुछ पल… सिर्फ बारिश की आवाज। फिर… एक हल्की सी चीख। और फिर सब कुछ खामोश। सुबह की हल्की धूप अभी पूरी तरह फैली भी नहीं थी। गांव के बाहर एक पेड़ के पास भीड़ जमा थी। लोग धीमी आवाज में कुछ कह रहे थे… कुछ डर से… कुछ उत्सुकता से। एक पुलिस जीप वहां आकर रुकी। दरवाजा खुला… और इंस्पेक्टर आरव सिंह बाहर उतरा। उसके चेहरे पर थकान थी… लेकिन नजरें तेज थीं। “क्या हुआ?” उसने पास खड़े सिपाही से पूछा। सिपाही ने धीरे से इशारा किया— “Sir… उधर…” आरव कुछ कदम आगे बढ़ा… और अचानक रुक गया। पेड़ से एक लड़की लटकी हुई थी। भीगे हुए कपड़े… सफेद पड़ा चेहरा… और वो चेहरा… आरव ने रात को सुना था। उसकी आंखों में एक पल के लिए ठहराव आया। उसने जेब से फोन निकाला… और कॉल हिस्ट्री खोली। रात 2:07 बजे… एक अनजान नंबर। उसने फोन वापस जेब में रखा। “सब लोग क्या कह रहे हैं?” उसने पूछा। “Sir… आत्महत्या…” सिपाही ने धीरे से कहा। आरव ने कोई जवाब नहीं दिया। वो पेड़ के पास गया… नीचे झुका… और जमीन को ध्यान से देखने लगा। मिट्टी में निशान थे। कदमों के निशान। लेकिन सिर्फ एक दिशा में— पेड़ की तरफ। वापस जाने का कोई निशान नहीं। उसने धीरे से कहा— “अजीब है…” “Sir?” सिपाही ने पूछा। आरव खड़ा हुआ… लेकिन उसकी नजरें अब भी जमीन पर थीं। तभी एक छोटा बच्चा पास आया। उसके हाथ में कुछ था। “Sir… ये मिला…” आरव ने उसकी तरफ देखा… और उसके हाथ से फोन लिया। फोन टूटा हुआ था… पानी से भीगा हुआ… लेकिन अभी भी चालू था। उसने स्क्रीन खोली… कुछ खास नहीं। फिर कॉल रिकॉर्ड देखा… आखिरी कॉल… उसी के नंबर पर। आरव की उंगलियां थोड़ी सख्त हो गईं। उसने धीरे से सांस ली… और चारों तरफ नजर दौड़ाई। भीड़ में से एक बूढ़ी औरत उसे देख रही थी। उसकी आंखों में डर था। वो धीरे से बोली— “ये तीसरी है…” आरव तुरंत उसकी तरफ मुड़ा— “क्या मतलब?” औरत घबरा गई… और चुप हो गई। आरव ने सिपाही की तरफ देखा— “पिछले कुछ महीनों में ऐसे कितने केस आए?” सिपाही ने थोड़ी देर सोचा— “Sir… ये तीसरा है…” आरव कुछ सेकंड तक चुप रहा। “तीनों में कुछ common?” “Sir… तीनों लड़कियां बाहर से आई थीं… काम के लिए…” अब आरव की आंखों में शक साफ दिख रहा था। उसने एक बार फिर पेड़ की तरफ देखा… फिर धीरे से कहा— “ये आत्महत्या नहीं है…” सिपाही चौंक गया— “Sir?” आरव ने उसकी तरफ देखा— “ये हत्या है।” वो जीप में जाकर बैठा। बारिश फिर से हल्की-हल्की शुरू हो चुकी थी। उसने फोन निकाला… और उसी नंबर पर कॉल किया। कुछ सेकंड तक नेटवर्क नहीं मिला… फिर कॉल लग गई। दूसरी तरफ खामोशी थी। “Hello? कौन?” आरव ने कहा। कोई जवाब नहीं। सिर्फ… हल्की-हल्की सांसों की आवाज। फिर एक बहुत धीमी फुसफुसाहट— “Sir… चौथी अभी जिंदा है…” आरव सीधा बैठ गया— “कौन? कहाँ?” लेकिन कॉल कट गई। आरव की नजरें धीरे-धीरे उस पेड़ की तरफ उठीं। हवा चल रही थी… टहनियां हिल रही थीं… और जमीन पर… उस जगह के पास… मिट्टी में कुछ उभर रहा था। एक निशान। अजीब सा। जैसे कोई चिन्ह… जिसका मतलब अभी किसी को नहीं पता। आरव ने धीरे से खुद से कहा— “ये मामला इतना आसान नहीं है…” और दूर कहीं… कोई मुस्कुरा रहा था।
Disclaimer: This show may contain expletives, strong language, and mature content for adult listeners, including sexually explicit content and themes of violence. This is a work of fiction and any resemblance to real persons, businesses, places or events is coincidental. This show is not intended to offend or defame any individual, entity, caste, community, race, religion or to denigrate any institution or person, living or dead. Listener's discretion is advised.
E1. रात के 2 बजे
E2. गुम हुई फाइल
E3. छुपा हुआ नाम
E4. गायब गवाह
E5. अंदर का गद्दार
E6. कंट्रोल


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