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Kabhi Kabhi Dil Ko

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5
|2
Romance

“सपनों की उड़ान” – एक स्त्री, एक परिवार और एक मिशन की कहानी यह सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है। यह सिर्फ संघर्ष की कहानी भी नहीं है। यह एक ऐसी स्त्री की....

“सपनों की उड़ान” – एक स्त्री, एक परिवार और एक मिशन की कहानी यह सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है। यह सिर्फ संघर्ष की कहानी भी नहीं है। यह एक ऐसी स्त्री की यात्रा है जिसने रिश्तों को बचाते हुए अपने सपनों को भी जिया… और सपनों को जीते हुए अपनी जड़ों को भी नहीं छोड़ा। “सपनों की उड़ान” सिया की कहानी है— एक साधारण लड़की, जो असाधारण हिम्मत रखती थी। शुरुआत – एक आम लड़की, असामान्य सोच सिया बचपन से ही संवेदनशील थी। उसे दूसरों का दर्द देख कर नींद नहीं आती थी। जब मोहल्ले में किसी का इलाज पैसे की कमी से रुक जाता, तो उसका मन बेचैन हो उठता। वह अक्सर सोचती— “क्या सच में दुनिया ऐसे ही चलती है? क्या किसी की जिंदगी पैसों की वजह से रुक जानी चाहिए?” उसकी यही सोच आगे चलकर उसकी पहचान बनने वाली थी। कॉलेज के दिनों में उसकी मुलाकात आरव से हुई। आरव शांत, समझदार और जमीन से जुड़ा हुआ लड़का था। वह बड़े-बड़े सपने नहीं दिखाता था… वह सिया के सपनों को समझता था। उनकी दोस्ती धीरे-धीरे भरोसे में बदली। और भरोसा प्यार में। लेकिन यह प्यार सिर्फ भावनाओं का नहीं था— यह एक-दूसरे के सपनों का साथ देने वाला प्यार था। शादी और नया संघर्ष शादी के बाद जिंदगी आसान नहीं रही। सीमित आमदनी, नई जिम्मेदारियाँ, समाज की अपेक्षाएँ—सब कुछ एक साथ। कुछ लोग कहते— “अब घर संभालो, ज्यादा ऊँचा मत सोचो।” कुछ कहते— “महिलाएँ समाज नहीं बदलतीं, बस परिवार संभालती हैं।” लेकिन सिया दोनों करना चाहती थी। वह घर भी संभालना चाहती थी और समाज भी बदलना चाहती थी। आरव ने उसका साथ दिया। “अगर तुम्हें लगता है कि तुम फर्क ला सकती हो… तो जरूर लाओ,” उसने कहा। यही वह पल था जहाँ कहानी ने पहला मोड़ लिया। फाउंडेशन की शुरुआत सिया ने एक छोटे से कमरे से हेल्थ सपोर्ट फाउंडेशन की शुरुआत की। ना बड़ा ऑफिस… ना बड़ी टीम… बस एक लैपटॉप, कुछ फाइलें और एक अटूट विश्वास। शुरुआत में बहुत मुश्किलें आईं। फंडिंग की कमी। लोगों का भरोसा जीतने की चुनौती। और कई बार खुद पर भी शक। लेकिन हर बार जब वह किसी जरूरतमंद की मदद कर पाती— उसे लगता, वह सही रास्ते पर है। धीरे-धीरे टीम जुड़ती गई। लोगों ने भरोसा दिखाया। छोटे प्रोजेक्ट बड़े बनने लगे। माँ बनना और संतुलन की परीक्षा जब आर्या का जन्म हुआ, सिया की जिंदगी बदल गई। अब वह सिर्फ समाज की जिम्मेदार नहीं थी— वह एक माँ भी थी। रात को बच्चे की देखभाल… सुबह मीटिंग्स… बीच में घर की जिम्मेदारियाँ… कई बार वह टूट जाती। कई बार सोचती— “क्या मैं दोनों भूमिकाएँ निभा पाऊँगी?” लेकिन आरव हमेशा साथ खड़ा रहा। वह सिर्फ पति नहीं था— वह उसका साथी, उसका दोस्त और उसका सबसे बड़ा सहारा था। पहला बड़ा अवसर – विदेश का प्रस्ताव एक दिन दुबई से प्रस्ताव आया— वहाँ फाउंडेशन की ब्रांच खोलने का मौका। यह मौका बहुत बड़ा था। लेकिन जोखिम भी उतना ही बड़ा। नया देश। नई संस्कृति। बच्ची का स्कूल। माँ की तबीयत। सिया के सामने फिर वही सवाल— सपना या स्थिरता? लंबी चर्चा के बाद उन्होंने फैसला लिया— वे दुबई जाएँगे। यह निर्णय आसान नहीं था। लेकिन कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित जगह छोड़नी पड़ती है। दुबई – नई जमीन, नई पहचान दुबई पहुँचते ही उन्हें महसूस हुआ— यह दुनिया अलग है। यहाँ सब कुछ तेज है। प्रतिस्पर्धा भी। जीवन की रफ्तार भी। आर्या को नए स्कूल में मुश्किल हुई। उसे अलग कहा गया। उसकी भाषा, उसका खाना, उसका पहनावा—सब अलग था। सिया का दिल टूटता था, लेकिन उसने अपनी बेटी को सिखाया— “अलग होना कमजोरी नहीं, पहचान है।” धीरे-धीरे आर्या ने खुद को साबित किया। और सिया ने भी। फाउंडेशन की दुबई ब्रांच चल पड़ी। लेकिन तभी एक बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी ने ऑफर दिया— भारी निवेश… लेकिन फैसलों पर उनका नियंत्रण। सिया ने मना कर दिया। क्योंकि उसके लिए मूल्य पैसे से बड़े थे। परिवार की पुकार इसी बीच भारत से खबर आई— माँ की तबीयत खराब है। सिया बिना देर किए लौट आई। उसने समझा— जड़ें मजबूत हों तो शाखाएँ दूर तक जा सकती हैं। कुछ हफ्तों बाद माँ ठीक हो गईं। और सिया ने फैसला लिया— हेड ऑफिस भारत में रहेगा। दुनिया तक पहुँचेंगे… लेकिन अपनी मिट्टी से जुड़े रहेंगे। ग्लोबल ह्यूमैनिटेरियन अवॉर्ड एक रात ईमेल आया— Global Humanitarian Award के लिए नामांकन। खुशी के साथ डर भी आया। क्योंकि सम्मान के साथ सवाल भी आते हैं। मीडिया इंटरव्यू। सोशल मीडिया पर चर्चा। आलोचना। कुछ लोगों ने पारदर्शिता पर सवाल उठाए। सिया ने पहली बार महसूस किया— ऊँचाई पर हवा तेज होती है। लेकिन उसने हार नहीं मानी। लंदन में मंच पर उसने जो भाषण दिया— वह सिर्फ उसका नहीं था, उन सबका था जिनकी आवाज़ नहीं सुनी जाती। खड़े होकर तालियाँ बजती रहीं। लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी जीत यह थी— वह अपने मूल्यों से नहीं डिगी। फिर एक नई चुनौती पुरस्कार के बाद ग्लोबल वि

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