
मृत्यु कुंड
गंगा किनारे बसे एक शांत-से गाँव के बीचोंबीच है — मृत्यु कुंड। तीन सौ साल पुराना, श्रापित जलाशय। कहते हैं, इसमें डूबने वाला कभी सच में नहीं मरता… वो रानी वसुधारा का हिस्सा....
गंगा किनारे बसे एक शांत-से गाँव के बीचोंबीच है — मृत्यु कुंड। तीन सौ साल पुराना, श्रापित जलाशय। कहते हैं, इसमें डूबने वाला कभी सच में नहीं मरता… वो रानी वसुधारा का हिस्सा बन जाता है। रानी वसुधारा को उसके ही राजघराने ने धोखा देकर इसी कुंड में जिंदा डुबो दिया था। मरते-मरते उसने शपथ ली — "हर पूर्णिमा को, एक आत्मा मेरी होगी।" जब शहर का पत्रकार राघव इस कुंड की सच्चाई खोजने आता है, तो वह लौटता है… मगर इंसान नहीं। अब उसकी आँखें सिर्फ अगले शिकार को ढूँढ रही हैं। हर मौत रानी को और शक्तिशाली बना रही है… और पूरा गाँव पानी की गहराई में खिंच रहा है। क्या पंडित हरिनारायण, वीर और शेखर समय रहते श्राप तोड़ पाएंगे? या फिर मृत्यु कुंड सबको अपनी अंधेरी गोद में समा लेगा?
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