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मंत्रजाल

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Suspense & Thriller

--- उपन्यास का नाम: मंत्रजाल शैली: वशीकरण • सस्पेंस • थ्रिलर • डार्क मिस्ट्री यह उपन्यास एक ऐसे शहर की कहानी है जहाँ वशीकरण सिर्फ अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक हथियार है। यहाँ मंत्रों....

--- उपन्यास का नाम: मंत्रजाल शैली: वशीकरण • सस्पेंस • थ्रिलर • डार्क मिस्ट्री यह उपन्यास एक ऐसे शहर की कहानी है जहाँ वशीकरण सिर्फ अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक हथियार है। यहाँ मंत्रों से केवल प्रेम नहीं, बल्कि इंसानों की इच्छा, सोच, यादें और आत्मसम्मान तक बाँधे जाते हैं। कहानी का केंद्र है देवगढ़, एक रहस्यमयी शहर, जहाँ बाहर से सब सामान्य लगता है लेकिन अंदर ही अंदर एक अदृश्य जाल फैला हुआ है। इस जाल का स्वामी है एक तांत्रिक — पंडित कालभैरव, जो लोगों के मन को नियंत्रित करने की कला जानता है। इस कहानी में: वशीकरण सिर्फ प्रेम पाने का साधन नहीं, बल्कि सत्ता, बदले और विनाश का माध्यम है हर पात्र के पास एक छुपा हुआ राज़ है कोई भी पूरी तरह अच्छा या बुरा नहीं सच्चाई धीरे-धीरे परतों में सामने आती है मुख्य विषय (Themes): मन की स्वतंत्रता बनाम नियंत्रण अंधविश्वास और तर्क की टक्कर प्रेम, जुनून और पागलपन की सीमाएँ शक्ति की भूख और उसका अंजाम मुख्य पात्र: आरव मल्होत्रा – एक तर्कशील पत्रकार, जो वशीकरण को झूठ मानता है पंडित कालभैरव – रहस्यमयी तांत्रिक, जिसका अतीत अंधेरे से भरा है सीमा – जिसकी बहन वशीकरण का शिकार है अनन्या – एक ऐसा पात्र जो आगे चलकर कहानी की दिशा बदल देता है हर भाग: न्यूनतम 5,000 शब्दों का होगा हर भाग का नाम और नंबर होगा हर भाग के अंत में तेज़ सस्पेंस या खुलासा होगा कहानी तब तक चलेगी जब तक आप स्वयं इसे समाप्त करने के लिए नहीं कहेंगे --- अब उसी कहानी को शुरू से नए सिरे से लिख रहा हूँ। --- उपन्यास: मंत्रजाल भाग 1: अध्याय 1 – शहर जहाँ मन बिकते हैं देवगढ़ का नाम सुनते ही लोगों के चेहरे बदल जाते थे। कोई उसे आस्था का नगर कहता, तो कोई डर का। पर सच्चाई यह थी कि देवगढ़ मन का शहर था। यहाँ लोग अपने शरीर से पहले अपना दिमाग खोते थे। सुबह के छह बजे थे। स्टेशन पर उतरते ही आरव मल्होत्रा ने पहली साँस ली और महसूस किया कि हवा में कुछ अजीब था। नमी नहीं, बदबू नहीं— बल्कि एक दबाव। जैसे कोई अनदेखा हाथ उसके सीने पर रखा हो। “नाटक है,” उसने खुद से कहा। आरव दिल्ली का जाना-माना पत्रकार था। तर्क, तथ्य और सबूत—यही उसकी दुनिया थी। वशीकरण, तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत—ये सब उसके लिए सिर्फ कहानियाँ थीं। देवगढ़ वह अपनी मर्जी से नहीं आया था। एडिटर ने फाइल फेंकते हुए कहा था— “लोग गायब हो रहे हैं, आरव। बदले हुए लौट रहे हैं। कुछ तो है वहाँ।” आरव हँस दिया था। अब वही हँसी उसे खोखली लग रही थी। स्टेशन से बाहर निकलते ही उसने देखा— हर दुकान के बाहर नींबू-मिर्ची, हर चौखट पर काला धागा, हर मोड़ पर कोई न कोई मंदिर। लेकिन लोगों की आँखों में शांति नहीं थी। सिर्फ डर था। “लक्ष्मी लॉज चलेंगे?” एक ऑटो वाले ने पूछा। ऑटो में बैठते ही आरव ने नोटिस किया कि रास्ते में कोई ज़ोर से बात नहीं कर रहा था। जैसे शहर खुद फुसफुसाता हो। “यहाँ लोग इतने चुप क्यों हैं?” आरव ने पूछा। ऑटो वाला हँसा नहीं। “यहाँ शब्द भी सुने जाते हैं, साहब।” आरव ने मज़ाक समझा। उसे नहीं पता था कि यह चेतावनी थी। लक्ष्मी लॉज पुरानी इमारत। सीढ़ियों पर जमी धूल। दीवारों पर उखड़ा रंग। रजिस्टर में नाम लिखते समय रिसेप्शन वाला लड़का काँप रहा था। “काम?” “पत्रकार।” लड़के की उंगलियाँ रुक गईं। “यहाँ लिखना आसान है, साहब… मिटाना मुश्किल।” कमरा नंबर 204। खिड़की के बाहर पीपल का पेड़ था—असामान्य रूप से विशाल। उसकी जड़ें ज़मीन नहीं, दीवारें पकड़ रही थीं। रात होते-होते आरव को सिरदर्द होने लगा। न कोई आवाज़, न कोई शोर— फिर भी बेचैनी। दरवाज़े पर दस्तक हुई। एक लड़की खड़ी थी। “मैं सीमा हूँ,” उसने कहा। “आप पत्रकार हैं… और मुझे आपकी ज़रूरत है।” उसकी आँखों में डर नहीं— बेबसपन था। “मेरी बहन को किसी ने बाँध लिया है,” सीमा फुसफुसाई। “वो हँसती है, बात करती है… लेकिन वो मेरी बहन नहीं है।” आरव ने पूछा, “किसने?” सीमा ने बस एक नाम लिया— “कालभैरव।” और उसी पल, कमरे की लाइट बुझ गई। अँधेरे में किसी के मंत्र पढ़ने की आवाज़ आई। धीमी… मगर सीधी दिमाग में उतरती हुई। दीवार पर लाल रंग उभरने लगा। “पहली डोर पड़ चुकी है।” आरव का दिल तेज़ धड़कने लगा। क्योंकि पहली बार उसके तर्क चुप थे और डर बोल रहा था।

Disclaimer: This show may contain expletives, strong language, and mature content for adult listeners, including sexually explicit content and themes of violence. This is a work of fiction and any resemblance to real persons, businesses, places or events is coincidental. This show is not intended to offend or defame any individual, entity, caste, community, race, religion or to denigrate any institution or person, living or dead. Listener's discretion is advised.

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