
एक असाधारण लड़का
सर्दियों की हल्की धुंध में डूबा वह छोटा-सा कस्बा, जहाँ गलियाँ इतनी तंग थीं कि दो साइकिल भी आमने-सामने से मुश्किल से निकल पातीं। वहीं एक टूटी-फूटी छत वाले मकान....
सर्दियों की हल्की धुंध में डूबा वह छोटा-सा कस्बा, जहाँ गलियाँ इतनी तंग थीं कि दो साइकिल भी आमने-सामने से मुश्किल से निकल पातीं। वहीं एक टूटी-फूटी छत वाले मकान में जन्मा था आरव आरव के पिता, रमेश, पास के सरकारी दफ़्तर में चपरासी का काम करते थे। तनख्वाह इतनी कम थी कि महीने का राशन जुटाना ही किसी युद्ध जीतने जैसा होता। माँ, सीमा, घर संभालती और कभी-कभी दूसरों के घर बर्तन माँजकर कुछ पैसे ले आतीं। बचपन से ही आरव का चेहरा मासूम मगर आँखें गहरी थीं। उन आँखों में अक्सर कोई सपना चमकता दिखता—जैसे वह अपनी गली के बाहर की दुनिया देख रहा हो। मोहल्ले के बच्चे जब गली में गिल्ली-डंडा खेलते, आरव अपनी पुरानी नोटबुक लेकर स्कूल की छत पर बैठ जाता। उसका मन किताबों और आसमान दोनों में खो जाता। पहली प्रेरणा एक दिन कस्बे के सरकारी स्कूल में विज्ञान प्रदर्शनी लगी। आरव ने पहली बार वहाँ एक मॉडल देखा—“हवाई जहाज़ का छोटा-सा रूप।” उसे देखकर उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने बगल खड़े टीचर से पूछा, “सर, ये उड़ता कैसे है?” टीचर मुस्कुराए, “बेटा, ये तो विज्ञान का जादू है। इंजन, हवा और पंखों का संतुलन। बड़े होकर पढ़ोगे तो समझ जाओगे।” उस दिन से आरव का सपना साफ़ हो गया—वह उड़ान भरना चाहता था। लेकिन यही सपना उसकी गली वालों के लिए मज़ाक था। “अरे, ये चपरासी का बेटा हवाई जहाज़ उड़ाएगा!” “हा हा, पहले घर का पंखा तो ठीक से चलवा ले।” लोगों की हँसी आरव के कानों में चुभती थी, मगर उसकी आँखों की चमक बुझ नहीं पाती थी। गरीबी का बोझ घर की हालत इतनी तंग थी कि पढ़ाई भी कई बार छूटने की नौबत आ जाती। स्कूल की फीस 50 रुपये महीना थी, और कई बार पिता समय पर नहीं दे पाते। आरव को शर्मिंदगी उठानी पड़ती—टीचर सामने खड़ा कर कहते, “फीस कब जमा होगी? अगर पढ़ना है तो समय पर पैसे दो।” आरव की आँखें झुक जातीं। लेकिन वह हार मानने वालों में से नहीं था। किताबें पुराने कबाड़ से, पन्ने उधार में, और कभी-कभी फटे कागज़ों पर लिखकर भी वह पढ़ाई करता। माँ का विश्वास जब पूरी दुनिया उस पर हँसती, उसकी माँ उसे चुपचाप सहलातीं। “बेटा, सपने बड़े रखो। भगवान देख रहा है। मेहनत करोगे तो एक दिन सब सच होगा।” माँ के ये शब्द आरव के लिए ढाल बन जाते। पहला संघर्ष कक्षा 8वीं में एक दिन प्रतियोगिता हुई—“आओ, भविष्य का भारत बनाओ।” बच्चों से कहा गया कि कोई भी मॉडल बनाओ जो देश के लिए उपयोगी हो। आरव के पास पैसे नहीं थे, लेकिन उसने कबाड़ से मोटर निकाली, पंखे की टूटी हुई पत्तियाँ लीं और एक छोटा-सा ‘विंड टर्बाइन’ बना दिया। प्रतियोगिता के दिन जब बच्चे रंगीन चार्ट और महँगे मॉडल लेकर आए, आरव का मॉडल सबसे अजीब लग रहा था। कई बच्चे हँस पड़े। लेकिन जज ने जब पूछा—“ये क्या है?” आरव ने पूरे आत्मविश्वास से समझाया— “सर, ये हवा से बिजली पैदा कर सकता है। गाँवों में जहाँ बिजली नहीं पहुँचती, वहाँ ये मदद करेगा।” जज चौंक गए। उन्होंने तालियाँ बजाईं और आरव को पहला स्थान दिया। उस पल आरव ने महसूस किया—लोग हँसेंगे, ताने देंगे, लेकिन मेहनत और सोच जीत सकती है। आरव की जीत ने पूरे कस्बे में हलचल मचा दी थी। स्कूल में बच्चे हैरान थे— “यार, ये तो गजब हो गया। जो हर बार पुराने कपड़े पहनकर आता है, वही पहला आया!” “अरे, किस्मत अच्छी थी बस… वरना इसका मॉडल तो कबाड़ जैसा था।” लोगों ने उसकी तारीफ़ से ज़्यादा उसके भाग्य को कारण माना। लेकिन आरव के लिए यह छोटा-सा सम्मान किसी पहाड़ पर पहला कदम रखने जैसा था