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भोले बाबा

भोले बाबा

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Drama

एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर, जिसमें डर भी है, दर्द भी, और धीरे- धीरे खुलते रहस्य भी. वो सुबह बाकी सभी सुबहों से अलग थी जब वायश नाम का लडका पहली बार गांव....

एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर, जिसमें डर भी है, दर्द भी, और धीरे- धीरे खुलते रहस्य भी. वो सुबह बाकी सभी सुबहों से अलग थी जब वायश नाम का लडका पहली बार गांव लौट रहा था, पंद्रह साल बाद, शहर में नौकरी करते करते उसने वो पुरानी मिट्टी की गंध तो भूल ही दी थी, पर अब जब दादी की मौत की खबर आई, तो जैसे दिल में कुछ हिल गया, वो गांव नहीं लौटना चाहता था, पर एक अधूरा रिश्ता उसे खींच लाया, बस से उतरते ही जब उसने पुराने पगडंडी पर कदम रखा तो उसे लगा जैसे सब कुछ वैसा ही है लेकिन कुछ बदला हुआ भी है, सडक पर अब भी वैसी ही धूल उडती थी, पेड वहीं थे, पर सब कुछ जैसे चुप था, जैसे कोई इंतजार कर रहा हो, उसकी हवेली – जिसे वो ‘काली कोठी’ कहता था – अब और भी जर्जर लग रही थी, दीवारों पर काई जम गई थी, खिडकियों पर मकडी के जाले थे और एक सर्दपन उसकी हड्डियों तक उतर गया था, दादी के कमरे में अब भी अगरबत्ती की गंध थी, पर वो कहीं नहीं थीं, बस एक पुरानी लकडी की अलमारी थी जिसमें एक तिजोरी थी – जंग लगी हुई – और उस पर खून से सने उंगलियों के निशान थे, वायश को ये सब अजीब नहीं लगा क्योंकि बचपन से ही उसे इस हवेली में कुछ गडबड लगती थी, दादी अक्सर कहती थीं –“ हर किसी के साथ एक साया चलता है. पर अगर वो साया तुमसे आगे चलने लगे, तो समझ लेना कुछ गलत है” वो तब हँस दिया करता था, पर अब वो हँसी गायब थी, पहली रात जब वो उस हवेली में सोया तो नींद में किसी ने उसका नाम पुकारा –“ वायश. आवाज धीमी थी, पर बहुत पास की, उसने आँखें खोलीं तो सामने कोई नहीं था, खिडकी से चाँद की रोशनी अंदर आ रही थी और दीवार पर उसका साया झूल रहा था. पर अजीब बात ये थी कि वो हिला नहीं, वो बैठा था, पर साया चल रहा था, उसने उठकर बत्ती जलाई, साया गायब, पर कमरे का तापमान जैसे अचानक बर्फ सा हो गया हो, अगले दिन गांव वालों से बात करने पर सबने उसकी तरफ ऐसे देखा जैसे उसने कोई पाप पूछ लिया हो, काली कोठी में अब कोई नहीं रहता बेटा. वो तो दादी भी पिछले दो साल से मंदिर के पीछे झोपडी में रहती थीं. ये सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि वो तो उसी हवेली में दादी से मिलने आया था, और जिस कमरे में रात बिताई थी, वो तो सालों से बंद पडा था, उसने तुरंत घर की तलाशी शुरू की, पुराने ट्रंक में दादी की डायरी मिली जिसमें लिखा था –“ अगर कोई मेरी मौत के बाद ये पढ रहा है तो समझ लो, मैं उसी साये से डर कर भाग गई थी. वो अब तुझे ढूंढेगा. तुझे याद है बचपन में तू रोता था तो कौन चुप कराता था? वो मैं नहीं थी. वायश के हाथ कांपने लगे, उसे याद आया कि हाँ, कई बार जब दादी सो रही होती थीं, कोई उसके पास बैठता था, बाल सहलाता था, lullaby गाता था, वो मानता रहा कि ये दादी हैं, पर अब. उस डायरी ने जैसे सब कुछ पलट दिया, शाम होते ही हवेली की दीवारें बोलने लगीं, पुराने खिलौनों की खडखडाहट, दरवाजे का बिना हवा के हिलना, और वो साया – जो अब उसकी परछाई में नहीं, उसके सामने खडा था, धीरे- धीरे उसने देखा कि वो उसकी ही शक्ल में है – चेहरा, आंखें, बाल, सब कुछ वही – पर उसकी आंखों में कोई आत्मा नहीं थी, वो बस घूरता था, मुस्कुराता था, और कहता था –“ अब मेरी बारी है” वायश चीखते हुए भागा, गांव की गलियों से निकल कर मंदिर तक पहुँचा, वहाँ के पुजारी ने उसे रोक कर माथे पर राख लगाई और कहा –“ तेरे साये ने रूप ले लिया है, अगर आज रात सूरज उगने तक तू जिंदा बच गया, तो फिर वो कभी लौटकर नहीं आएगा. लेकिन अगर हार गया. तो वो ही तुझमें समा जाएगा. और तू खुद को कभी पहचान नहीं पाएगा” वायश अब हवेली लौट आया है, उसके चारों तरफ दीये जलाए गए हैं, मंत्र गूंज रहे हैं, लेकिन वो जानता है – असली लडाई तो अब शुरू हुई है, साया अब भी उसके सामने खडा है, और कह रहा है –“ हर रात जब तुम सोए, मैं जागा. अब मेरी नींद की बारी है.

Disclaimer: This show may contain expletives, strong language, and mature content for adult listeners, including sexually explicit content and themes of violence. This is a work of fiction and any resemblance to real persons, businesses, places or events is coincidental. This show is not intended to offend or defame any individual, entity, caste, community, race, religion or to denigrate any institution or person, living or dead. Listener's discretion is advised.

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