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भक्त और भगवान

भक्त और भगवान

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Historical

भक्ति का विस्तार भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन की हर श्वास में ईश्वर की अनुभूति का नाम है। जब मन, वाणी और कर्म—तीनों ईश्वर से....

भक्ति का विस्तार भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन की हर श्वास में ईश्वर की अनुभूति का नाम है। जब मन, वाणी और कर्म—तीनों ईश्वर से जुड़ जाते हैं, तब भक्ति का सच्चा विस्तार होता है। 1. हृदय से आरंभ भक्ति का जन्म हृदय में होता है—प्रेम, श्रद्धा और समर्पण से। बिना स्वार्थ के किया गया स्मरण ही इसकी पहली सीढ़ी है। 2. विचारों में भक्ति जब मन के विचार शुद्ध होते हैं, अहंकार कम होता है और करुणा बढ़ती है, तब भक्ति विचारों में फैलती है। हर प्राणी में ईश्वर का दर्शन होने लगता है। 3. कर्म में भक्ति सेवा, दया, सत्य और परोपकार—ये भक्ति के कर्मरूप हैं। भूखे को भोजन देना, दुखी को सहारा देना भी उतनी ही बड़ी भक्ति है जितनी मंदिर में दीप जलाना। 4. समाज में भक्ति भक्ति जब व्यक्ति से निकलकर समाज में जाती है, तब वह धर्म बन जाती है—नफरत छोड़कर प्रेम, भेद छोड़कर समानता और हिंसा छोड़कर शांति का मार्ग दिखाती है। 5. आत्मा तक विस्तार अंततः भक्ति आत्मा को परमात्मा से जोड़ देती है। तब साधक को न सुख का लोभ रहता है, न दुःख का भय—केवल आनंद और शांति शेष रहती है। संक्षेप में: भक्ति का विस्तार हृदय से शुरू होकर विचार, कर्म, समाज और अंत में आत्मा तक पहुँचता है। यही भक्ति मानव को मानव और जीवन को दिव्य बनाती है।

Disclaimer: This show may contain expletives, strong language, and mature content for adult listeners, including sexually explicit content and themes of violence. This is a work of fiction and any resemblance to real persons, businesses, places or events is coincidental. This show is not intended to offend or defame any individual, entity, caste, community, race, religion or to denigrate any institution or person, living or dead. Listener's discretion is advised.

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