
Balavir
। यह परिलोक का सामान्य मौन नहीं था—यह वह शांति थी जो किसी गहरे घाव के बाद आती है। उसकी आँखें भारी थीं, शरीर में थकान थी, और चेतना जैसे कई परतों में बँटी हुई थी। उसने हिलने की कोशिश की, लेकिन लगा जैसे उसकी आत्मा अभी पूरी तरह लौटकर शरीर में नहीं बैठी हो। धीरे-धीरे दृश्य स्पष्ट हुआ। वह दीप-आश्रम में था—परिलोक का वह स्थान जहाँ केवल वही वीर लाए जाते थे जिन्होंने युद्ध नहीं, निर्णय लड़ा हो। यहाँ न तो शस्त्र रखे जाते थे, न ही प्रशिक्षण होता था। यहाँ केवल प्रतीक्षा और आत्मबोध था। उसके पास नीलकंठ बैठे थे। उनका मुख शांत था, लेकिन आँखों में गहराई थी—जैसे किसी ने मृत्यु को बहुत पास से देखा हो और लौट आया हो। “तुम जाग गए,” नीलकंठ ने कहा। बालवीर कुछ बोल नहीं पाया। उसका गला सूखा था, और भीतर एक अजीब खालीपन था। “मैं… हार गया?” उसने धीमे स्वर में पूछा। नीलकंठ मुस्कुराए—हल्की, थकी हुई मुस्कान। “अगर तुम हार गए होते,” उन्होंने कहा, “तो यह लोक अभी काँप रहा होता।” --- भीतर का घाव बालवीर ने आँखें बंद कर लीं। उसे नगर याद आया। लोगों की खाली आँखें
Disclaimer: This show may contain expletives, strong language, and mature content for adult listeners, including sexually explicit content and themes of violence. This is a work of fiction and any resemblance to real persons, businesses, places or events is coincidental. This show is not intended to offend or defame any individual, entity, caste, community, race, religion or to denigrate any institution or person, living or dead. Listener's discretion is advised.Less

