
सांसों की सेतु
बेंगलुरु की ठंडी हवा आदित्य के कमरे की खिड़की से टकरा रही थी। कमरे में अंधेरा था, सिर्फ लैपटॉप की नीली रोशनी आदित्य के चेहरे पर पड़ रही थी। वह....
बेंगलुरु की ठंडी हवा आदित्य के कमरे की खिड़की से टकरा रही थी। कमरे में अंधेरा था, सिर्फ लैपटॉप की नीली रोशनी आदित्य के चेहरे पर पड़ रही थी। वह पिछले दो घंटों से एक ही एक्सेल शीट को घूर रहा था, लेकिन उसका दिमाग कहीं और था। उसका हाथ बार-बार मेज पर रखे फोन की तरफ जाता, फिर रुक जाता। आदित्य (मन में): "क्या वह सो गई होगी? जयपुर में तो आज बारिश बता रहे थे। कहीं उसे डर तो नहीं लग रहा? नहीं... अगर मैं अभी मैसेज करूँगा तो शायद उसकी नींद खराब हो जाए। पर अगर वो मेरा इंतज़ार कर रही हुई तो?" आदित्य के चेहरे पर एक अजीब सी कशमकश थी—एक तरफ फिक्र, दूसरी तरफ हक जताने का डर। उसने फोन उठाया, पासवर्ड डाला और व्हाट्सएप खोला। 'Muskan ' का चैट बॉक्स सबसे ऊपर था। 'Last seen: 1:15 AM'।
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