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अजलान की दास्तान

अजलान की दास्तान

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Fantasy

सोचो, तुम्हारी उम्र पंद्रह साल। और एक दिन तुम्हें पकड़ लिया जाए। पत्थर की ठंडी मेज़ पर बाँध दिया जाए। और तुम्हारे सीने में... एक ऐसी चीज़ डाल दी जाए....

सोचो, तुम्हारी उम्र पंद्रह साल। और एक दिन तुम्हें पकड़ लिया जाए। पत्थर की ठंडी मेज़ पर बाँध दिया जाए। और तुम्हारे सीने में... एक ऐसी चीज़ डाल दी जाए जो धीरे-धीरे तुम्हारी रूह खा रही हो। तीन साल। बस तीन साल तुम्हारे पास हैं। उसके बाद? मौत। यही हुआ अजलान के साथ। उसे फेंक दिया गया एक द्वीप पर। नाम था — रूहख़ोर द्वीप। वहाँ सौ बच्चे थे। सबकी एक ही कहानी। सबके सीने में वही ज़हर। सबके पास वही तीन साल। लेकिन बाहर सिर्फ़ दस निकलेंगे। बाक़ी नब्बे? यहीं मिट्टी में मिल जाएँगे। ज़िंदा रहना है तो एक ही रास्ता — एक रूही साथी ढूँढो। कोई जानवर, कोई जीव, जो तुम्हारी रूह से जुड़ जाए। तुम मज़बूत होगे तो वो मज़बूत होगा। तुम कमज़ोर पड़े तो वो भी। और हाँ, तुम मज़बूत रहोगे तो शायद... शायद तुम्हारे अंदर का वो जानवर थोड़ा धीरे खाए तुम्हें। बाक़ी बच्चे झुंड बना के रहते थे। एक-दूसरे से लिपटे, डरे हुए, रोते हुए। अजलान? वो अकेला निकल गया। सबसे ख़तरनाक जंगल में। क्योंकि उसे पता था — अगर बचना है तो साधारण साथी से काम नहीं चलेगा। उसे चाहिए था सबसे ताक़तवर रूही साथी। और वहाँ, उस अंधेरे जंगल में, उसे मिली एक ज़ख़्मी चाँदनी लोमड़ी। माथे पर आधे चाँद का निशान। दुर्लभ। ख़ूबसूरत। ख़तरनाक। और सबसे अहम बात — इसकी ताक़त की कोई हद नहीं थी। अजलान ने उससे हाथ बढ़ाया। पैवंद बाँधने के लिए। लोमड़ी ने काट लिया। दोबारा हाथ बढ़ाया। फिर काट लिया। सात बार कोशिश की अजलान ने। सात बार वो लोमड़ी ने ना की। आठवीं रात। अजलान बिलकुल टूट चुका था। भूखा। बीमार। थका हुआ। मौत के क़रीब। इस बार उसने ज़ोर नहीं डाला। बस धीरे से कहा— "मैं तुम्हें ग़ुलाम नहीं बनाना चाहता। मैं बस... बस साथ ज़िंदा रहना चाहता हूँ।" और उस रात, उस लोमड़ी ने अजलान को चुन लिया। उसके बाद? लड़ाई शुरू हुई। ख़ून बहा। लाशें गिरीं। अजलान जीतता गया। मज़बूत होता गया। लेकिन साथ-साथ... कुछ और भी होता गया। उसके अंदर का इंसान मरने लगा। क्योंकि देखो, जितना वो लड़ता है, जितना वो जीतता है, उतनी तेज़ी से उसके अंदर का वो रूह-ख़ोर जानवर जागता है। पल रहा है। बड़ा हो रहा है। अब अजलान के पास सवाल एक नहीं रहा। पहले सवाल था — क्या मैं ज़िंदा रहूँगा? अब सवाल है — अगर मैं ज़िंदा रहा... तो क्या इंसान रहूँगा? या कुछ और बन जाऊँगा? तो सुनो — 'अजलान की दास्तान'।

Disclaimer: This show may contain expletives, strong language, and mature content for adult listeners, including sexually explicit content and themes of violence. This is a work of fiction and any resemblance to real persons, businesses, places or events is coincidental. This show is not intended to offend or defame any individual, entity, caste, community, race, religion or to denigrate any institution or person, living or dead. Listener's discretion is advised.

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